भोजशाला में अखंड और निर्विघ्न पूजा- सकल हिंदू समाज की महाविजय

संकल्प से सिद्धि की ओर जब आगे बढ़ते हैं तो संघर्ष और कानून इन दोनों ही आयामों पर कार्य करना आवश्यक होता है।

माँ सरस्वती मंदिर भोजशाला, धार में आज बसंत पंचमी के पायन पर्व पर हजारों की संख्या में श्रद्धालुओं ने माननीय सर्वोच्च न्यायालय के निर्णय के बाद हर्ष, गौरण, उत्साह, आहार, सकारात्मक भाष और पूर्णत निर्भीक होकर सूर्योदय से सूर्यास्त तक माँ के दर्शन, पूक्न, हवन में सहभागिता करी। यह धार के सकल हिंदू समाज की महाविश्य है।
हिंदू पर्कट फार जस्टिस, सुप्रीम कोर्ट के परिष्ठ अधिवक्ता हरिशंकर जैन, विष्णु शंकर जैन रंजना अग्निहोत्री, हाईकोर्ट इंदौर एडवोकेट विनय जोशी, याचिकाकर्ता आशीष गोयल ने इस सफल आयोजन पर धार के सकल हिंदू समाज बधाई दी है। भोज उत्सव समिति ने समा? जागरण, समाज संगठन एवं अखंड पूजा हेतु व्यापक जन बागरण अभियान चलाया। हिंदू फंट फॉर जस्टिस नेम जिला प्रशासन, पुलिस प्रशासन, मीडिया वर्ग का आभार माना है एवं आशा व्यक्त कि है कि बहुत जल्द ही भोजशाला पर हिंदू समाज का पूर्ण आधिपत्य होगा।

मैं भोजशाला हूँ

मैं भोजशाला हैं। इतिहास में दफ्न हूँ, किन्तु मुझे खोद-खोद कर निकालते रहने वाले खुद भी नहीं जानते कि मैं अभी और कितने भीतर हूँ। में दहाथों सदी में ही राजा मुंज के समय में बनकर तैयार हो चुकी थी। नालंदा और तक्षशिला के बाद सबसे बड़ा विश्वविद्यालय में ही थी। दूर-दूर से विद्वान् मेरा वैभव देखने आते. फिर यहाँ से जाने का नाम नहीं लेते। आत्मा मुंज ने मेरी बहुत सेवा की। तभी तो जब यह नहीं रहा, तब पूरे भारत के विद्वानों के मुँह से यही एक वावय निकलता था-गते मुंगे यशः पुंजे निरालम्बा सरस्वती यशस्वी मुंज के जाने बाद सरस्वती निरालम्व को
गई)। मुंव के बाद राजा भोज ने मेरे ऐश्वर्य में चार चाँद लगा दिये। यह महान् पराक्रमी सम्राट् होने के साथ-साथ सच्चा सरस्वती पुत्र था। अपने समय में यह राजा से भी अधिक भोजशाला का कुलपति था। मेरे पास वे चौदह सी पंडित थे, जी अलग-अलग विषयों के विद्वान् थे। मैं चार मंजिला विशाल और भग्य इमारत थी, जिसमें अनवरत वेदपाठ गूंजते रहते। मेरे पास कचि थे, वैज्ञानिक थे, शिल्पी थे, येदों के महान् आचार्य थे। धनंजय ने यहीं बैठकर दशरूपक लिखा, वो भरत मुनि के बाद नाट्यशास्त्र का सर्वश्रेष्ठ ग्रंथ है। मेरी ख्याति सुनकर उम्बर काश्मीर से पैदल चलकर यहाँ आया, और यहीं उसने सबसे पहला चेद-भाष्य लिखा। तब मुझे अखंड भारत की काशी कहा जाता था। यहाँ शारत्रयांएँ होती, एक साथ कई वीणाएँ अनम्ननातीं, मेरे विशाल प्रांगण में आकाशचारी विमान का प्रदर्शन होता और श्रसमरांगण सूत्रधार की विवेचना होती। मेरे परिसर के बीचों-चीच वह विशाल यज्ञशाला अब भी है, जहाँ राजा भोज सहस्रों ब्राहमणों के साथ बैठकर देवों का आह्वान करते थे। बहुतों को नहीं मालूम, कि मेरे पास भी अज्ञानवापी है। इस पापी की धारा नगरी के बच्चे चूड़े अब भी अकल कुईध के नाम से जानते हैं। इसका अमृत जल पीकर कई लीग तर गये। यहाँ कभी वाग्देवी की बहुत सुंदर प्रतिमा स्थापित थी। वह याग्देवी ही इस विश्वविद्यालय की कुलस्वामिनी कहलाती थी। सच तो यह है, कि तब मैं भोजशाला नहीं, याग्देवी सरस्वती का ऐसा भव्य मंदिर थी, जैसा इस धरती पर और कहीं भी नहीं था। महमूद गजनवी ने सोमनाथ मंदिर को लूटने के बाद मुझे ही लूटने का मन बनाया था, लेकिन मुंज और भोज के प्रतापी सैनिकों ने उसके धार में घुसने के सब रास्ते रोक दिये, और यह मालवा को छोड़कर कच्छ सिन्ध होकर भाग गया। राजा भीत्र ने मेरा यश इतना बढ़ा दिया था, कि मैं और वह एक हो चुके थे। पाश्चात्य विद्वान् ती आज भी भोज को भारतीय आगस्टस फहते हैं। राजा भीव के बाद जयसिंह उदयादित्य, लक्ष्मणदेव,
यशोवर्मदेष, नरवर्मदेव, अर्जुनवर्मदेव और देवपाल देव ने मेरी सुरक्षा में कोई कोर कसर नहीं छोड़ी। मेरे प्रांगण में आज भी व्याकरण को शिक्षा से जुड़े हुए जो दो सर्पबंध पत्थर पर दे हुए हैं. ये भोज के इन परवर्ती राजाओं की रुचि और कौशल के प्रतीक हैं। पारिजातमंजरी नाम का एक पूरा नाहक ही मेरी भिति पर उत्कीर्ण है। तेरहवीं सदी में मेरा नाम काशी और अतिका के विद्वानों में पूजा भाव से लिया जाता था। उस लकड़‌हारे की चचर्चा होती थी, जिसने संस्कृत भाषा के एक अशुद्ध प्रयोग पर राजा भीज को टोक दिया था. चही लकड़‌हारा बाद में मेरा द्वारपडित नियुक्त हुआ।
चौदहवीं सदी की शुरुआत में अलाउद्दीन खिलजी मुझे लूटने और तहस-नहस करने के इरादे से आया। राजा मैकलदेव और उसकी सेना ने अलाउद्दीन खिलजी को रोकने की पुरजोर कोशिश की, किन्तु सफल नहीं हुए। अलाउद्दीन मेरे भीतर तक पुस आया। उसके हुक्म पर मेरे प्रांगण में रखी हुई देव-प्रतिमाएँ और प्रस्तर-शिल्प खंड-खंड कर दिये गये। जब यह आया, तब मेरे यहाँ बारह सौ विद्वान् पंडित स्वाध्याय में थे। वे वेदाभ्यास कर रहे थे। अलाउद्दीन ने मेरे ही प्रांगण में मेरे ही पुत्रों का खुला कत्लेआम किया। मैं चीत्कार उठी, किन्तु मेरी चीख पुकार सुनने वाला तब कोई नहीं था। मेरो आत्मा ने जो कंदन किया, उसकी प्रतिध्वनि अब भी दूर-दूर तक सुनाई देती है। अलाउद्दीन तो अपने गुलामों को
यहाँ तख्त पर बैठा कर चला गया। उसके जाने के बाद दिलावर गौरी खान, हुरांगशाह, गजनी खाँ, महमूद खाँ ने बारी चारी से मुझे नोंचा। इन्होंने आधी सदी तक इतने आघात दिये मुझे, कि आईना सामने हो, तो मैं स्वर्थ की पहचान नहीं सकती। वर्ष 1457 में महमूद खान ने मेरे परिसर में भारी उत्पात मचाया। बंद और धर्मशास्त्र को महत्वपूर्ण पांडुलिपियाँ जला डाली, महत्वपूर्ण ऐतिहासिक शिलालेखों के तुकड़े-टुकड़े कर उन्हें दफन कर दिया। पत्थरों पर उकेरे हुए पवित्र स्तोत्रों को नीचे पटक कर उनकी मर्यादा को तार-तार कर दिया। में गूक थी, किन्तु वह सब मैंने बेबस होकर देखा है। राजा भोज की देहत्याग के बाद
एक-दो नहीं चार सदियों तक मैंने तूफान झेला है। आखिरी की दो सदियों में तो मेरे यहाँ सनातन धर्म की मानने वालों का प्रवेश भी वर्जित था। वर्ष 1724 में एक बार फिर परमारों के हाथ में बागडोर आई। मुझे कुछ आस बंधी। उदाजीराव पवार ने अपना युद्ध कौराल तो खूब दिखाना, लेकिन मेरी सुध नहीं ली। न उन्होंने, न उनके बाद के परमारों ने। मैं पूरी तरह खंडहर में तब्दील ही गई। मेरे अहाते में गाय-बोर बंधने लगे। चारा और गोबर के ढेर लगने लगे। एक वक्त तो ऐसा भी आया, जब मैं धारा नगरी की सबसे गंदी और प्रदूषित जगह थी। मुझसे अच्छे ती मुंज के बनवाये गये चारह तालाब थे। ब्रिटिश शासन ने मुझे
अपनी पारखी नजर से मेरी अस्मिता को पहचान लिया था, लेकिन मैं इतनी लुटी-पिटी थी, कि मुझे हजार बरस पहले की दशा में लौटा पाना किसी के लिये सम्भव नहीं था। ब्रिटिश सरकार ही मेरे यहाँ से वान्देवी की प्राणप्रतिष्ठित और पूजित प्रतिमा को उग्रकर लंदन ले गये, जहाँ वह आज केवल शोभा की वस्तु है और अपने घर लौटने की कसमसा रही है। इधर मुझे सहेजने के छुटपुट प्रथास राज्य स्तर पर हुए, होते भी रहे, जी नाकाफी थे। फिर एक दौर वह भी आया, जब इस्लाम धर्म को मानने वालों ने मुझे नमाज पढ़ने के लिये उपयुक्त जगह समझी। वे आने लगे, बार-बार आने लगे, और फिर आते चले गये। धीरे-धीरे उन्हें लगने लगा कि मेरी जगह उन्हींकी है, उन्हींके लिये खुद्य ने बख्शी है। अब वे इस जगह के लिये दावा भी करने लगे। उन्होंने मुझे किसी कमाल मौलाना करे दरगाह तक बता दिया। मुझे सब और से इस तरह बैंक दिया गया, कि में बहर से आने वालों को एक बड़ी और मजबूत मस्जिद ही दिखें। यह सब दिखावा इन बीते सी सालों के भीतर का है। पहले मुझे मुस्लिम हुक्मरानों ने सताया, अब मजहबपरस्तों के निशाने पर बनी हुई है। आजाद भारात में सरकारें आई, गर्दै। सब आँख मूँद कर तमाशा देखती हुई अपनी कुर्सी बचाने में लगी रहीं। हाँ, मेरी ओर से संघर्ष करते रहे हैं धारा नगरी के वे बारिदि, जो आव भी स्वयं को एवा भोज की प्रजा मानते हैं। उन्होंने मेरे लिये न्यायमंदिर के द्वार खटखटाये। बार-बार खतखटागे। सनातन धर्म की जयजयकार करने वाले मेरे साथ खड़े हुए दिखाई दे रहे हैं। मेरे पास छिपाने के लिये कुछ नहीं है। पिछले एक हजार साल का इतिहास मेरे सामने चलचित्र की तरह है। बस, वही एक बार सच देख लें। अब में विश्वविद्यालय का स्वप्न तो नहीं देख सकती, लेकिन वाग्देवी का श्रृंगार और उसका वसंत तो भरपूर देख ही सकती हूँ।

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